Saturday, 9 June 2012

गाँव में अब तक ,
बदलाव के नाम पर
देखा है-
बिना तार के खम्बे,
सूखी हुई नहरें,
टूटे हुए खडंजे,
बजबजाती हुई नालियां,
और बाड़े जैसे
स्कूल और अस्पताल.

और देखा है उसी गाँव में -
नेता जी के पास
गाड़ियों का अम्बार
दारू के ठेके,
ईंट के भट्टे,
बड़े-बड़े बंगले
चमचो की फ़ौज,
दुनाली बंदूकें,
कब्जे की जमीन,
हडपी हुई संपत्ति,
गैर कानूनी पैसा,

और साथ ही देखे हैं-
गर्मी में जलते हुए बदन
ठण्ड में ठिठुरते हुए बच्चे,
बरसात में बहता सामान,
बेघर परिवार,
टीबी से खांसते मजदूर,
चलनी हांथों वाले किसान,
प्रसव पीड़ा से मरती महिलाएं,
हैजा से मरते मासूम,

और देखा है-
विधायक का एसी कमरा ,
डॉक्टर की प्राइवेट क्लिनिक,,
नंबर दो की दवाई,
दावा पर कमीसन,
नए नए बनते मकान और बंगले,
बढ़ता हुआ बैंक बैलेंस,

साथ ही देखा है
जमीन के लिए रोते किसान,
बिना चप्पल चक्कर काटते
आग सी गरम रेत पर,
कभी तहसील कभी थाने
कभी वकील के पास,

देखा है मुट्ठी भर लोगों के घर
इफरात खाना
कूड़े दानो में पड़ा हुआ,
कुत्ते के बर्तन में भरा दूध,
मवेशियों के आगे हरी सब्जी का ढेर,

उसी गाँव में देखा है,
भूंख से मरता हुआ आशाराम का बेटा
जिसको मिल न सका
एक कतरा दूध
दवा के लिए,
एक रोटी
पेट की आग बुझाने के लिए,
दो गोली लाल या पीली
दो दिन जीने के लिए,

भारत महाशक्ति बन रहा है,
मॉल,मेट्रो,मल्टीप्लेक्स से
इसकी शोभा बढ़ रही है,
खरबों के गुब्बारे लग रहे है,
करोड़ों के हांथी फब रहे है,
लाखों के टोइलेट बन रहे है,
बच्चे को टैबलेट मिल रहा है,
फोर्मुला वन रेस हो रही है,
आइपीएल का सर्कस हो रहा है,
शेयर मार्केट बल्लियों उछाल रहा है,
अजी-करोड़ों के तो केवल
घोटाले हो रहे है,

फिर भी हर रोज
मर रहे है लाखों करोड़ों
आशा राम के बेटे .....
दवा नहीं -रोटी के बगैर
जिसको छीन लिया है
मुनाफे के सौदागरों ने|

Friday, 27 January 2012

betiyon ke liye

वैसे तो अवसर बहुत खास था, 
किन्तु हर चेहरा उदास था, 
बाग में फूल नया आया था,
उसका आगम माली को नहीं भाया था,
घर में ख़ामोशी छाई थी,
होंठों पर झूठी बधाई थी, 
सबका चेहरा अजीब सा बना था,
पता है क्यूँ ?- पता है क्यूँ ?
क्यूँ कि –
बहू ने बेटी को जना था.
बहू ने बेटी को जना था.
बहू ने बेटी को जना था.

मुश्किल


मुश्किल नहीं है
हवा के खिलाफ चलना,
बहना धरा के विरुद्ध,
नाही मुश्किल है समर्पण,
मार लेना इच्छाओं को भी 
मुश्किल नही है,
मुश्किल है---
मुश्किल है परम्पराओं को तोडना,
रीतियों की अवहेलना- मुश्किल है,
मुश्किल है ठहराव को तोडना 
बहना नयी दिशा में -मुश्किल है,
मुश्किल है  सही  को सही कहना ,
झूट को नकारना -मुश्किल है,
मुश्किल है साहस बटोरना
लड़ना हक़ के लिए -मुश्किल है...

दोहे

जहाँ भूख की आग में जलता हो इंसान,
नारा वहीं बुलंद है मेरा देश महान||




अर्थनीति और राजनीति का मिला हुआ यह तंत्र,
ना बाक़ी अब गण रहा- ना बाक़ी गणतंत्र ||


जीवन में उनके कभी रहता नहीं विषाद.
गौरव जिनके साथ हो माँ का आशीर्वाद ||



Saturday, 17 September 2011

चंद शेर .........................

बुजर्गो को हिकारत की नजर से देखने वाले,
कभी औलाद वाले वो भी होंगे भूल जाते है |

जो जागी अनगिनत राते की बेटा चैन से सोये, 
वही जब खांसती है तो, बेटा चीख पड़ता है |

जो ओहदेदार होकर भी करें इंसानियत की बात, 
बुलंदी ऐसे ही कदमो में अपना सर झुकाती है |

जिसने बच्चों की खातिर रखे हो बेवजह रोज़े, 
उसे खाने को मिलती है, बासी बची रोटी |

बुजर्गो को हिकारत की नजर से देखने वाले....
कभी औलाद वाले वो भी होंगे भूल जाते है ......."साहिल"